एक ख्वाब - मशीनों का शोर - दिल की कविता
एक ख्वाब
दिन भर साइट की धूल में, खुद को जलाता हूँ,
शाम को कागज़ पर, अपनी रूह सजाता हूँ।
लोग कहते हैं कि मैं सिर्फ दीवारें चुनता हूँ,
उन्हें क्या पता, मैं हर ईंट में एक ख्वाब बुनता हूँ।
लोहे के सरियों में उलझी है, मेरी ये जवानी,
सीमेंट की महक में दबी है, मेरी हर कहानी।
धूप की तपिश में जब, पसीना बहता है मेरा,
शब्दों की छाँव में तब, सुकून मैं पाता हूँ।
मशीनों के शोर में भी, एक लय ढूँढ लेता हूँ,
भीड़ के इस मेले में, मैं खुद को चुन लेता हूँ।
काम मेरी रोटी है, मगर कविता मेरी जान है,
इसी कश्मकश में मैं, अपनी पहचान बुनता हूँ।
🙏 जय हिंद 🙏
अहसास डायरी ✍️
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