मरहम : सिसकियों से सजदा तक (भाग - 5 )
मरहम : सिसकियों से सजदा तक
भाग ५ - इबादत ( रूह का ठहराव )
वक़्त की लहरें भला अब क्या बिगाड़ेंगी,
ये दूरियां अब हमें कैसे पछाड़ेंगी।
हम वो किस्सा हैं जो खामोश रह कर भी,
आने वाले कल की दीवारों पर दहाड़ेंगी।
न अब जिस्म की प्यास है, न शब्दों का मोह,
हम रूह बन गए हैं, जैसे सुबह की पहली लौ।
मिटा दी हैं हमने सारी हदें सरहदों की,
अब मैं "मैं" नहीं रही, और तुम "तुम" नहीं रहे वो।
तुम मिले तो जैसे हर इबादत पूरी हुई,
पुरानी कोई अधूरी सी मन्नत पूरी हुई।
अब न जन्नत की आरज़ू है, न खुदा की तलाश,
तुम्हारी मौजूदगी में ही, मेरी हर जन्नत पूरी हुई।
ये 'मरहम' से शुरू हुआ सफर, अब दुआ बन गया,
हर दर्द, हर आंसू, जीने की वजह बन गया।
अब खामोशी में भी हम एक-दूजे को पढ़ते हैं,
हमारा प्यार ही अब, हमारा खुदा बन गया।
सफर अब थम सा गया है, पर खत्म नहीं हुआ,
कि दर्द जो मरहम बना, वो अब खुदा हो गया।
अंतिम
🙏जय हिन्द 🙏
आपका अपना
अहसास डायरी ✍️
- यह कविता आपको कैसी लगी ?
- कैसे लगी आपको हमारा "मरहम" ?
- क्या आपके साथ कोई है, जो अब प्यार नहीं खुदा है ?
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Nice
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