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मुसाफिर और मुकद्दर

 

★ मुसाफिर और मुकद्दर ★

शिकायतों के कागज़ मैंने,

हवा में आज उड़ा दिए,

जिंदगी के कड़वे पन्ने,

मैंने खुद ही मुस्कुरा के जला दिए,

बड़ी शोर थी मेरे भीतर,

कि मैं अकेली हूँ इस सफ़र में,

मुड़कर देखी तो अक्स ने मेरे,

हौसलों के दीये जला दिए,

वो जो दर्द था जिसे मैं,

उम्र भर का बोझ समझती रही,

हजारों उलझनें थीं रास्तों में,

मगर ये समझ अब आई है मुझे,

कि बिना ठोकर के मंजिल कोई नहीं, 

अब न खौफ है अंधेरों का,

न धूप से कोई गिला है,

मुझे आज बरसों बाद,

मेरी ही लापता पता मिली है,

जिंदगी ने कान में बस इतना कह दिया,

तू जिसे हार समझ रही थी,

वो तेरी जीत का सिलसिला है...!



🙏 जय हिंद 🙏


आपका अपना

अहसास डायरी ✍️


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Comments

  1. Kavita sharma09:23

    Beautiful poetry

    ReplyDelete
  2. Pawan Kumar17:08

    Bahut sundar poetry

    ReplyDelete

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