मरहम - सिसकियों से सजदा तक (भाग - 3)
मरहम - सिसकियों से सजदा तक
भाग 3 - सुकून एक आगाज़
न मरहम की तलाश अब, न कोई सवाल है,
तुम्हारी बाहों में सिमटा, मेरा हर हाल है।
खिड़की से आती धूप अब, चुभती नहीं मुझे,
तुम्हारे साथ होने का, ये कैसा कमाल है।
जो बुझे थे दीये, वो मशाल बन गए,
उलझे हुए किस्से, अब मिसाल बन गए।
किताब के पुराने पन्ने, महकने लगे फिर से,
सादे से वो लफ्ज़, अब ख़्याल बन गए।
अब न साँस घुटती है, न दिल घबराता है,
अँधेरा भी अब तुमको देख, पास आने से कतराता है।
सुलझ गई हूँ ऐसे, जैसे धागा हो रेशम का,
अंत हुआ तन्हाई का, और आगाज़ हुआ 'हम' का।
न अब मंज़िल की जल्दी है, न रास्तों का डर है,
जहाँ तुम साथ चलते हो, वहीं अब मेरा घर है।
कल तक जो शोर था, वो संगीत बन गया,
खामोशी में भी अब, एक खूबसूरत असर है।
हाथों में हाथ तुम्हारा, जैसे दुआ का असर हो,
अब हर ढलती शाम, जैसे एक नई सहर हो।
मिट गए वो फासले, जो कभी दीवार थे,
सुकून का ये समंदर, अब ज़रा और गहरा हो।
To be continued....
🙏 जय हिन्द 🙏
आपका अपना
Ahasas Diary ✍️
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करते है एक नई शुरूआत,
ReplyDeleteहार कर बैठ जाना "जिंदगी" नहीं होती
NXT part?
ReplyDelete🥰
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