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मरहम - सिसकियों से सजदा तक ( भाग - 1)



★ मरहम - सिसकियों से सजदा तक

भाग 1: पुकार


इस दर्द के लिए तुमको मरहम बना लूं क्या,
तुम कहो तो थोड़ी सी मुस्कुरा लूं क्या।
मुझें फिर से क़िस्मत आज़मानी है अपनी,
फिर से एक बार तुमसे दिल लगा लूं क्या।
साँस लेती हूं तो दम सा घुटता है,
तुम्हारे दिल में एक खिड़की बना लूं क्या।


काटती है हर रात मुझे अंधेरों में,
बुझे दिये को फिर से जला लूं क्या।
सूरज की किरणें मेरे चेहरे को छू रही,
किरणों से खुद को चमका लूं क्या।
उलझी हूं खुद में, तुम कहो तो खुद को सुलझा लूं क्या।



आँखें भी थक गई हैं अब सपनो से,
तुम कहो तो हकीकत बना लूं क्या।
पुरानी किताबों के कुछ पन्ने जैसा,
कहो तो फिर से एक बार जीवन बना लूं क्या।
दर्द है तुमसे दूरी और तन्हाई का,
इस दर्द के लिए तुमको मरहम बना लूं क्या...!

To be continued.....

🙏 जय हिंद 🙏
आपका अपना 
Ahasas Diary ✍️ 

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