यादों का घेरा
★ यादों का घेरा ★
वक्त की गर्द में ख़ुद को छुपा रही है ना,
पुरानी यादों को ज़ख्म बना रही है ना,
दफ़न है जो तूफान तेरे सीने के भीतर,
वो आँसू बनकर रुला रही है ना,
वो जो मंज़िल नहीं, उसे मुसाफ़िर बना लिया,
झूठी उम्मीदों की आग में तू खुद को जला रही है ना,
वह शख्स जो तेरी हर सांस का हिस्सा है,
क्यों उसे अपनी खामोशी से तड़पा रही है ना,
खामोश लबों पर सिसकियाँ भारी हैं,
ये कैसी खुद से ही खुद की जंग जारी है,
अजब कशमकश है तेरी इस मोहब्बत की,
वो ज़हर है,
फिर भी उसे दवा बता रही है ना...!
🙏 जय हिंद 🙏
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