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फिर से 'मैं' होना चाहती हूँ

★ मैं फिर से 'मैं' होना चाहती हूँ ★


मैं फिर से 'मैं' होना चाहती हूँ
इन रिश्तों की बंदिशों से परे,
एक छोटा सा आसमाँ चाहती हूँ,
जहाँ मैं किसी की ज़रूरत न बनूँ,
बस अपना ही एक ठिकाना चाहती हूँ।


सुबह की धूप खिड़की पर आए,
पर कोई मुझे उठाने वाला न हो,
रात की चांदनी में देर से लौटूं,
पर कोई सवाल उठाने वाला न हो।


माँ, बेटी, पत्नी, बहन—
इन नामों के पीछे कहीं खो गई हूँ मैं,
जिम्मेदारियों की चादर ओढ़कर,
वक्त से पहले ही सो गई हूँ मैं।


मैं कहना चाहती हूँ वो अनगिनत बातें,
जो रातों की तन्हाई में सिसकती हैं,
साझा करना चाहती हूँ वो तकलीफें,
जो सीने में आग बन धधकती हैं।
होकर अनजान दुनिया की नज़रों से,
खुद की पहचान फिर से पाना चाहती हूँ,
भूलकर सारे सलीके और कायदे,
मैं अपना वो बचपना आजमाना चाहती हूँ।


न काम का बोझ हो, न घर की फिक्र,
न किसी और की खुशियों का ख्याल,
शोर थमे सब रिश्तों का, बस दिल की एक सदा रहे,
न मैं किसी की आस बनूँ, न मुझमें कोई बसा रहे,
धड़कन अपनी सुन सकूँ, इतना सन्नाटा चाहती हूँ,
मैं खुद को खुद से मिला सकूँ, वो एक लम्हा चाहती हूँ।


न कोई जवाब हो, न कोई मलाल,
हाँ, मैं भी थोड़ा जीना चाहती हूँ,
एक लड़की बनकर, बस अपने लिए,
खुद को समेटकर इस भीड़ से,
एक मुकम्मल लम्हा जीना चाहती हूँ।


अनगिनत बातें, अधूरी ख्वाहिशें और खुद से मिलने की एक छोटी सी कोशिश।
हर रिश्ते से परे, आज मैं सिर्फ अपनी होना चाहती हूँ।। 
🌿

🙏जय हिन्द 🙏

                                               आपका अपना
AhasasDiary ✍️


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Comments

  1. Anonymous05:24

    ❣️❣️❣️

    ReplyDelete
  2. राधे राधे05:25

    कुछ पल तो गुजरिए खुद के साथ में🤗

    ReplyDelete
  3. Anonymous14:36

    Nice

    ReplyDelete
  4. Ramesh14:37

    Beautiful line

    ReplyDelete
  5. Anonymous16:02

    Very nice

    ReplyDelete
  6. Anonymous16:02

    Very nice

    ReplyDelete

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