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मेरी रूह और तुम


★ मेरी रूह और तुम ★

लोग तो बातें बनाते ही थे हमारे नाम की,

बदनाम तो हम हमेशा से थे आपकी मोहब्बत में,

मगर पहले सिर्फ दिल्लगी थी,

अब जान पर बन आई है,

अभी तो बस समझ आई है,

कि मोहब्बत होती क्या है...!

अजीब दस्तूर है तुम्हारी वफ़ाओं का भी,

फासले बढ़ा लिए पर धड़कनों से जाते नहीं,

रूह में बसे हो और खुद को अजनबी कहते हो,

ये कैसी बेरुखी है कि पहचानते तक नहीं मुझे,

जबकि आईना देखूँ तो अक्स तुम्हारा ही दिखता है...!

मैं चाहूँ भी तो तुम्हें खुद से जुदा नहीं कर सकती,

उस खुशबू को मिटाना मेरे बस की बात नहीं,

मैं मर भी जाऊँ तो मेरी कब्र से वही महक आएगी,

जिसमें आपकी मोहब्बत आज भी महकती है...!



🙏 जय हिंद  🙏 


आपका अपना 

अहसास डायरी ✍️ 


● क्या आपने कभी किसी को इतनी शिद्दत से चाहा है कि खुद में भी वही नजर आने लगे ?

● क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि कोई रूह में तो बसा हो, पर सामने अजनबी बन कर खड़ा हो ?

● क्या दूरियां वाकई प्यार कम कर पाती हैं ?

● क्या प्रेम मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है ?

● मोहब्बत में दुनिया की बातों से डरना चाहिए या अपनी रूह की सुननी चाहिए ?

● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करे। 

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