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तू ही मेरी इबादत

 


★ तू ही मेरी इबादत ★

मैं ढूँढूँ दुनिया में खुद को,

जैसे कोई पर्वत खड़ा,

तू मिल जाए तो लगता है,

मेरा सफर बस अब है बढ़ा,

वो पत्थर जैसी सीने की धड़कन,

तुझसे ही मचलती है,

तेरे आँचल की छाँव मिले तो,

रूह मेरी संभलती है,

तू है सुकून मेरा,

तू ही है मेरा हर रास्ता,

तू शक्ति मेरी,

तू ही मेरी श्रद्धा का वास्ता...!

सजे हों छप्पन भोग भले,

महकती हो ये थालियाँ,

तेरे बिना फीकी लगती हैं,

ये सब रंग-बिरंगी खुशियाँ,

जैसे कान्हा को तुलसी भाए,

बिन उसके भोग अधूरा है,

तेरा साथ न हो जो साथ मेरे,

तो जग ये सब कोरा है,

तू सावन की पहली बूंद,

मैं प्यासी जमीं का रास्ता,

तू शक्ति मेरी,

तू ही मेरी श्रद्धा का वास्ता...!

दुनिया की तलवारें लेकर,

मैंने तो जग को जीत लिया,

पर तुझसे जो एक लफ्ज़ सुना,

मैंने खुद को जीत लिया,

बड़े-बड़े सम्राट झुके,

जो तेरी आँखों के आगे,

जीत का असली गहना तो,

बस तेरी सादगी में जागे,

तू ही मेरी जीत की मंजिल,

तू ही मेरा इकलौता राब्ता,

तू शक्ति मेरी,

तू ही मेरी श्रद्धा का वास्ता...!

एक तू है, जो कर्म की राह में,

मेरी ढाल बन जाती है,

एक मैं हूँ, जो श्रद्धा में तेरी,

खुद को भूल जाता हूँ,

ये सृष्टि की जो डोरी है,

तूने ही तो ये बुनी है,

तू न हो तो मौन धरा,

तू हो तो भोर की सुबह है,

तू ही मेरी इबादत है,

तू ही मेरी प्रार्थना का वास्ता,

तू शक्ति मेरी,

तू ही मेरी श्रद्धा का वास्ता...!


🙏 जय हिंद 🙏 


आपका अपना 

अहसास डायरी ✍️ 


● कवि ने अपनी 'शक्ति' किसे माना है और उनके होने से कवि के जीवन में क्या बदलाव आता है ?

● 'छप्पन भोग' और 'तुलसी' के उदाहरण से कवि क्या कहना चाहता है ?

● 'दुनिया को जीतना' और 'खुद को जीतना' - इन दोनों में कवि के लिए ज्यादा जरूरी क्या है और क्यों ?

● कठिन समय में 'ढाल' बनने से कवि का क्या अर्थ है ?

● यह कविता पढ़ने के बाद आपको कैसा महसूस हुआ ? क्या आपको लगा कि यह किसी खास के प्रति समर्पित है ?

● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।

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