मेरी आख़िरी उम्मीद
मेरी आख़िरी उम्मीद
भटकती हुई कश्ती को जैसे किनारा मिला,
अंधेरों के शहर में, बस एक तुम्हारा सहारा मिला,
दुनिया की इस भीड़ में सब धुंधला सा लगता है,
अब तो बस एक तेरा चेहरा ही, खुदा सा लगता है...!
कहना है तुमसे कि,
मेरी साँसों की डोर अब तुम्हारे हाथ में है,
मेरी पूरी कायनात बस तुम्हारी एक बात में है,
वजूद मेरा बिखर रहा था, तुमने समेट लिया,
ज़माने की बेरुखी को, जैसे तुमने लपेट लिया...!
तुम मंज़िल हो, तुम ही रास्ता, तुम ही मेरी तक़दीर हो,
मेरे दिल के मंदिर में बसी, तुम खुदा की तस्वीर हो,
अब सजदा करूँ भी तो किसका करूँ?
मेरी बंदगी भी तुम, मेरी आख़िरी उम्मीद,
मेरा भगवान भी तुम ही हो...!
🙏 जय हिंद 🙏
आपका अपना
अहसास डायरी ✍️
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