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अनकही मंज़िल

★ अनकही मंज़िल ★

खामोशियों की तह में, चलो खुद को तलाश करते हैं,

बिना कहे एक दूजे का, अब हम विश्वास करते हैं...!


न लफ्ज़ होंगे होंठों पर, न बातों का ही डेरा होगा,

जहाँ सिर्फ तुम ठहरोगे, वहीं अब घर मेरा होगा...!

पुराने सब गिले-शिकवे, हवा में हम उड़ा देंगे,

मोहब्बत की नई खुशबू, फिज़ाओं में जगा देंगे...!


ज़माने की बंदिशों से, चलो अब दूर चलते हैं,

जहाँ दो दिल, सिर्फ़ अपनी ही धड़कन में पिघलते हैं...!

न कोई शर्त होगी अब, न कोई वादा चाहेंगे,

तुम्हारी एक मुस्कुराहट में, हम जन्नत पा ही जाएंगे...!


चलो तन्हाई की चादर, ज़रा सी और बुनते हैं,

जहाँ रूहें बात करती हैं, वो सन्नाटे को सुनते हैं...!

हकीकत हो या सपना हो, तुम्हें ही पास पाएँ हम,

सुकूँ की उस गुज़ारिश में, मुकम्मल हो ही जाएँ हम...!


🙏 जय हिंद 🙏 


आपका अपना 

अहसास डायरी ✍️ 


● क्या आपके पास भी कोई ऐसी बात है जो 'अनकही' रह गई, पर आज भी आपके दिल के करीब है ?

● आपके लिए 'सुकून' का मतलब क्या है—किसी का साथ, या बस एक शांत लम्हा ?

● क्या आपको भी लगता है कि पुरानी यादों को हटाकर नई शुरुआत करना ज़रूरी है ?

● इस कविता की कौन सी लाइन आपके दिल को सबसे ज्यादा छू गई ?

● क्या आपने कभी किसी के साथ ऐसी खामोशी साझा की है, जहाँ शब्दों की ज़रूरत ही न पड़ी हो ?

● उलझे हुए रिश्तों को सुलझाने के लिए आपकी नज़र में सबसे ज़रूरी चीज़ क्या है—माफ़ी या बाते ?

● नीचे कमेंट्स में अपनी अहसास साझा करें।

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