निंदिया रानी की नाराज़गी
★ निंदिया रानी की नाराज़गी ★
पहले तो तू बिन बुलाए ही आ जाती थी,
अपनी मीठी थपकी से मुझे सुलाती थी,
सुबह जल्दी उठना है कहकर कानों में चिल्लाती थी,
और अपनी बाहों में समेटकर, जन्नत के ख़्वाब दिखाती थी,
अब क्यों मुझे एक पल के सुकून को तरसाती हो?
मुझसे लिपटकर सोने से अब क्यों कतराती हो...?
वो प्यारे सपने, वो प्यार, वो हक़...
क्यों अब घंटों मुझे इंतज़ार कराती हो?
निंदिया रानी फिर मुस्कराकर बोली:
क्यों न मैं तुम्हें अब यूँ ही सताऊं?
क्यों फिर से लौटकर तुम्हारे पास आऊं?
जब तूने ही मेरा साथ बेदर्दी से छोड़ दिया,
तो अब मैं तुझसे वफ़ा क्यों निभाऊं ?
जिस 'काम' की चमक या 'किसी' की याद के लिए तूने मुझे ठुकराया,
अब जा उन्हीं से कह दे कि वो तुझे सुला दें,
मैं क्यों फिर से अपना प्यार जताऊं !
वो हक़ जो सिर्फ मेरी थी,
तूने किसी और की झोली में डाल दिया,
तू जनता था दुनिया में मुझ जैसा वफ़ादार कोई नहीं मिलेगी,
फिर भी तूने मेरी वफ़ा का हिस्सा, गैरों के नाम कर दिया...!
अब किस मुँह से उन थकी हुई आँखों को सुनहरे ख़्वाब दिखाऊं,
देख तोड़ दिए न उसने भी वो सारे झूठे सपने तेरे,
खैर रूह का रिश्ता है हमारा,
मैंने तुझे माफ़ किया अब लौट आ मेरी पनाह में,
दुनिया को ज़रा बाहर रहने दे,
चल आज फिर तुझे 'तेरी अपनी निंदिया' रानी से मिलाऊं...!
आपका अपना
अहसास डायरी ✍️







वफा का हाथ थामकर वो फिर लौट आई है,
ReplyDeleteपुराने जख्मों पर उसने मरहम सी लगाई है।
शिकायतों का दौर खत्म हुआ 'सी.पी' अब,
सुकून की चादर ओढ़, देखो फिर नींद आई है।