लिखा है क्या लकीरों में
★लिखा है क्या लकीरों में★
लिखा है क्या लकीरों में,
मुझे पढ़ना नहीं आता...!
तू ही बता दे क्या है लिखा,
ओ खुदा मेरे...!
बस इतना बता दे मुझे....✍️!
जिंदगी ये मेरी है बस इतनी सी,
ना जाने क्यों है ये मुझसे ख़फ़ा सी..!
कह दे क्यों है ख़फ़ा तू मुझसे,
ऐ जिंदगी...!
ना जाने क्यों है इतनी उदासी,
जिंदगी से मेरी...✍️!
पूछती हूँ खुद से,
क्या कमी रह गई है...!
मेरी इन आँखों में,
क्यों नमी रह गई है...!
सब कुछ तो किया मैंने,
जो तूने कहा था...!
फिर क्यों मेरी खुशियाँ,
कहीं थमी रह गई हैं...!
ओ खुदा मेरे...!
बस इतना बता दे मुझे....✍️!
पत्थर की बन गई हूँ,
अब रोया नहीं जाता...!
ये दुखों का जो समंदर है,
अब सोया नहीं जाता...!
तू तो सबका खुदा है,
फिर मेरा क्यों नहीं होता...!
मेरी तन्हाई देख कर,
तेरा दिल क्यों नहीं रोता...!
ओ खुदा मेरे...!
बस इतना बता दे मुझे....✍️!
ये खामोश सितम...!
तोड़ दे ये साँसें,
या मिटा दे ये गम...!
बिखर चुकी हूँ मैं,
जैसे कांच का टुकड़ा हो...!
अब तू ही बता,
कैसे जोड़ूँ ये मुखड़ा...!
ओ खुदा मेरे...!
बस इतना बता दे मुझे....✍️!
चाहती हूँ,
कि तू भी मेरा हाल देख ले...!
मेरे इन बेज़ुबान सवालों का,
कोई तो जवाब भेज दे...!
बहुत भारी है ये उदासी,
अब उठाई नहीं जाती...!
मेरे बिखरे हुए इन टुकड़ों को,
तू ही समेट दे...!
ओ खुदा मेरे...!
बस इतना बता दे मुझे....✍️!
हार चुकी हूँ अब मैं,
इस बोझ को उठाते उठाते...!
अकेले में खुद को,
यूँ ही समझाते-समझाते...!
अगर मेरा नसीब,
तेरे ही हाथों में है खुदा...!
तो क्यों रखा है मुझे,
तूने खुशियों से जुदा...!
ओ खुदा मेरे...!
बस इतना बता दे मुझे....✍️!
लिखा है क्या लकीरों में,
मुझे पढ़ना नहीं आता...!
तू ही बता दे क्या है लिखा,
ओ खुदा मेरे...!
बस इतना बता दे मुझे....✍️!










Lovely
ReplyDelete👌👌👌
ReplyDeleteSad but lovely poetry 😊
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