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खुद की तलाश

 ★ खुद की तलाश ★

खिड़की से झांकी तो एक मंजर नया था,

धूल जमी थी जिस पर, वो आईना मेरी थी।

मैंने पूछा— थक गई हो क्या यूँ चलते-चलते?

वो बोली — अभी तो बस मुड़ना सीखी थी।

हौसलों की पोटली में थोड़े छेद क्या हुए,

मुझे लगा कि किस्मत के सितारे ही सो गए।

पर उन छेदों से जो रोशनी अंदर आई,

तभी समझ आई कि मैं कितनी रोशन हो गई।

तलाश बाहर नहीं, बस अंदर की एक पुकार है,

हार में भी छिपी, जीत की एक दरार है।

मंजिल मिले न मिले, ये रास्ता ही घर है,

जिंदगी से अब कोई शिकवा नहीं, बस प्यार है।


🙏 जय हिंद 🙏


आपका अपना

अहसास डायरी ✍️


● यह कविता आपको कैसी लगी ?

● क्या आपने आज अपने अंदर के उस आईने की धूल साफ की, जो आपको आपकी असली ताकत दिखा सके?

● जिस मोड़ को आप अंत समझ कर थक गए हैं, क्या पता वहीं से आपकी नई कहानी शुरू होनी हो ?

● सवाल यह नहीं कि किस्मत सोई है या जाग रही है, सवाल यह है कि क्या आप अपनी ही रोशनी को पहचान पा रहे हैं ?

● नीचे कमेंट में अपनी अहसास साझा करें।



Comments

  1. Anonymous06:29

    Khud ki talas beautiful kavita 👌

    ReplyDelete
  2. Rajesh09:41

    Mast 👌

    ReplyDelete
  3. Nidhi17:22

    Beautiful 😍

    ReplyDelete
  4. Anonymous22:50

    Bahut badiya poetry hai well done

    ReplyDelete

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