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Showing posts from January, 2026
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प्यार हो गया : मोहब्बत की आरजू

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  प्यार हो गया मोहब्बत की आरज़ू  आज फिर मुझे चांद की दीदार हो गया, ना करते हुए भी रब पे ऐतबार हो गया,,  लाख मना किया था इस पागल दिल को, फिर भी इस पागल को उनसे प्यार हो गया,, सोचा था नहीं करूंगा मोहब्बत कभी किसी से, पर उनको देखकर दिल बेहाल हो गया,, आज ही कर दुं उनको दिल की हाल ये बयां, पर करूं कैसे, दिल का ये सवाल हो गया,, खोना नही चाहता मैं अपनी प्यारी दोस्त को, कैसे बात करूं, सोच सोच कर परेशान हो गया,, मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा कैसे जाकर बोलूं, हे हिरणी, तू मेरी जिन्दगी, तू ही मेरी जान हो गया।। 🙏 जय हिंद 🙏 आपका अपना अहसास डायरी ✍️ यह कविता आपको कैसी लगी ? क्या आपको भी कभी किसी से प्यार हुआ है? क्या किए थे आप प्यार होने पर? नीचे कमेंट में अपनी अहसास साझा करें। 

सुकून : अधूरी इश्क़

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★ सुकून ★ अधूरी इश्क़ की दास्तां   महसूस तुम्हें रोज करतीं हुँ,  तुम भी तो मुझे हर रोज, महसूस करते होगे ना,  यादों में, ख़्यालों में,  हर लम्हां साथ होते हों,  रातों में, नींदो में,  हर लम्हां जगाते हो, उलझन में, सूकून में,  हर लम्हां साथ होते हों,  बीते कल की यादों में,  आज भी खोई हूँ,  आने वाला कल भी,  मुझ पे हँसता हैं,  और कहता है छोड़ उन यादों को,  और चल आगे बढ़ मेरे साथ, कदम से कदम मिला कर, कैसे समझाऊ उस कल को,  बीते हुए कल ने,  मेरी जिंदगी छीन ली, कैसे चलूं मैं तुम्हारें साथ, कदम से कदम मिला कर, क्यूँकी मुझे पता हैं, मेरा सूकून तो, आज भी कल भी वहीँ हैं...! 🙏 जय हिन्द 🙏 आपका अपना अहसास डायरी यह कविता आपको कैसी लगी ? क्या आपके जिंदगी में भी कोई था/थी, जिनके यादों में आप जी रहे हो? नीचे कमेंट में अपनी अहसास साझा करें।                           

फिर से 'मैं' होना चाहती हूँ

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★ मैं फिर से 'मैं' होना चाहती हूँ ★ मैं फिर से 'मैं' होना चाहती हूँ इन रिश्तों की बंदिशों से परे, एक छोटा सा आसमाँ चाहती हूँ, जहाँ मैं किसी की ज़रूरत न बनूँ, बस अपना ही एक ठिकाना चाहती हूँ। सुबह की धूप खिड़की पर आए, पर कोई मुझे उठाने वाला न हो, रात की चांदनी में देर से लौटूं, पर कोई सवाल उठाने वाला न हो। माँ, बेटी, पत्नी, बहन— इन नामों के पीछे कहीं खो गई हूँ मैं, जिम्मेदारियों की चादर ओढ़कर, वक्त से पहले ही सो गई हूँ मैं। मैं कहना चाहती हूँ वो अनगिनत बातें, जो रातों की तन्हाई में सिसकती हैं, साझा करना चाहती हूँ वो तकलीफें, जो सीने में आग बन धधकती हैं। होकर अनजान दुनिया की नज़रों से, खुद की पहचान फिर से पाना चाहती हूँ, भूलकर सारे सलीके और कायदे, मैं अपना वो बचपना आजमाना चाहती हूँ। न काम का बोझ हो, न घर की फिक्र, न किसी और की खुशियों का ख्याल, शोर थमे सब रिश्तों का, बस दिल की एक सदा रहे, न मैं किसी की आस बनूँ, न मुझमें कोई बसा रहे, धड़कन अपनी सुन सकूँ, इतना सन्नाटा चाहती हूँ, मैं खुद को खुद से मिला सकूँ, वो एक लम्हा चाहती हूँ। न कोई जवाब हो, न कोई मलाल, हाँ, मैं भी थोड़ा ...

मरहम : सिसकियों से सजदा तक (भाग - 5 )

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  मरहम : सिसकियों से सजदा तक भाग ५ - इबादत ( रूह का ठहराव ) वक़्त की लहरें भला अब क्या बिगाड़ेंगी, ये दूरियां अब हमें कैसे पछाड़ेंगी। हम वो किस्सा हैं जो खामोश रह कर भी, आने वाले कल की दीवारों पर दहाड़ेंगी। न अब जिस्म की प्यास है, न शब्दों का मोह, हम रूह बन गए हैं, जैसे सुबह की पहली लौ। मिटा दी हैं हमने सारी हदें सरहदों की, अब मैं "मैं" नहीं रही, और तुम "तुम" नहीं रहे वो। तुम मिले तो जैसे हर इबादत पूरी हुई, पुरानी कोई अधूरी सी मन्नत पूरी हुई। अब न जन्नत की आरज़ू है, न खुदा की तलाश, तुम्हारी मौजूदगी में ही, मेरी हर जन्नत पूरी हुई। ये 'मरहम' से शुरू हुआ सफर, अब दुआ बन गया, हर दर्द, हर आंसू, जीने की वजह बन गया। अब खामोशी में भी हम एक-दूजे को पढ़ते हैं, हमारा प्यार ही अब, हमारा खुदा बन गया। सफर अब थम सा गया है, पर खत्म नहीं हुआ, कि दर्द जो मरहम बना, वो अब खुदा हो गया। अंतिम 🙏 जय हिन्द   🙏 आपका अपना अहसास डायरी ✍️ यह कविता आपको कैसी लगी ? कैसे लगी आपको हमारा "मरहम" ? क्या आपके साथ कोई है, जो अब प्यार नहीं खुदा है ? नीचे कमेंट में अपनी अहसास साझा करें।

दोस्ती से दिलबर तक

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  ★ दोस्ती से दिलबर तक ★ हमारी यारी तू गुल बने, मैं तेरी गुलिस्तां बन जाऊं, तू रूठे अगर, मैं प्यार से तुझे मनाऊं। हो जब भी तुझे अपनी तन्हाई का एहसास, मैं बनके साया तेरे साथ नज़र आऊं। गर सुनना चाहे तू बीते कल का कोई गीत, मैं यादों के उस दौर में तुझे ले जाऊं। जब-जब तुझे तलब हो मेरी आवाज़ की, मैं थोड़े माशूकाना नखरे दिखाऊं। कभी फोन न उठाऊं, कभी हो जाऊं लापता, तड़प उठे तू, ऐसी तुझे अपनी याद दिलाऊं। ऐ दोस्त! अब तो मान भी जा मेरी बात, कि मैं तुझ पर अपनी ये जान लुटाऊं। बन जा हमसफ़र तू मेरी दोस्ती की राह में, साथ जीने की मैं तुझे कोई वजह बताऊं। ऐसी खुशनसीब किस्मत भला कहाँ से लाऊं, कि उम्र भर के लिए बस तेरा साथ पाऊं। मेरी दोस्ती की सरहद, तेरे प्यार तक ही है, मेरा वजूद मेरी जान, बस तेरे साथ तक ही है। 🙏 जय हिन्द 🙏   आपका अपना  Ahasas Diary ✍️  आपको यह कविता कैसे लगी? क्या आपके पास भी है कोई ऐसा दोस्त? कमेंट बॉक्स में लिखकर अपना विचार हमसे साझा करें।

मरहम : सिसकियों से सजदा तक ( भाग 4 )

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  मरहम : सिसकियों से सजदा तक भाग 4 - मुकम्मल वादा एक नई इबादत अब न कोई शर्त है, न ही कोई दस्तूर है, तुम्हारा साथ होना ही, मेरा सबसे बड़ा नूर है। जो कभी डर था कि खो न दूँ तुम्हें कहीं, अब उस डर से मेरा दिल, कोसों दूर है। तुमने थामी जो उँगली, तो चलना सीख लिया, गिरते हुए लम्हों को, संभलना सीख लिया। तुम वो आग हो जिसने जलाया नहीं मुझे, बल्कि अंधेरों में धूप बनके, ढलना सीख लिया। लिखेंगे अब मिलकर एक नई दास्तां अपनी, जहाँ हर पन्ने पर होगी, सिर्फ़ मुस्कुराहट अपनी। न होगा कोई दर्द जिसका मरहम ढूँढना पड़े, अब तो खुदा भी देखेगा, ये इबादत अपनी। हाथों की लकीरों को अब पढ़ना छोड़ दिया मैंने, किस्मत का सारा बोझ, तुम पर मोड़ दिया मैंने। तुम ही दुआ हो मेरी, तुम ही मेरा खुदा, इस टूटे हुए दिल को, अब तुमसे जोड़ दिया मैंने। To be continued... 🙏 जय हिंद 🙏 आपका अपना   अहसास डायरी ✍️  यह कविता आपको कैसी लगी ? क्या आप भी किसी से कोई वादा किए है ? नीचे कमेंट में अपनी अहसास साझा करें।

खूबसूरत लम्हें

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                             ★ खूबसूरत लम्हें ★ "दास्ताँ-ए-अहसास" (Besty forever) तू गुल बने, मैं गुलिस्ता बन जाऊँ,  तू रूठे, मैं प्यार से तुझे मनाऊँ,  तुझे जब तन्हा लगे, मैं हर पल साथ नजर आऊं,  गीत सुनना चाहे अगर तू,  मैं बीते कल की यादों में ले कर जाऊँ, ऐ दोस्त मान भी जाओ,  मैं तुझ पर अपनी जान लुटाऊं,  बन जा मेरी हमसफर, दोस्ती की मंजिल में, साथ जिंदगी जीने की वजह बताऊ,  दोस्ती हो गई तुमसे इस कदर, मैं तेरे लिए अब हद से गुजर जाऊँ,  जब जब सुनना चाहेगी मेरी आवाज,  मैं तुझे थोड़ी नखरे दिखाऊ, कभी फोन उठाऊ, कभी अचानक लापता हो जाऊँ,  कुछ इस कदर मैं तुझे याद अपनी दिलाऊं,  कितना खूबसूरत होगा वो लम्हा,  जब हम दोनों फिर से वही पुरानी यादों में खो जाए, तेरे लिए क्या लिखू,  कभी शब्द बनते हैं,  कभी बिगड़ते हैं,  कुछ ऐसी ही हैं,  तेरी मेरी कहानी...! 🙏 जय हिन्द 🙏 आपका अपना अहसास डायरी  ✍️  आपको यह कविता कैसे लगी? क्या आपके पास भी है कोई...

मरहम - सिसकियों से सजदा तक (भाग - 3)

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  मरहम - सिसकियों से सजदा तक   भाग 3 - सुकून एक आगाज़   न मरहम की तलाश अब, न कोई सवाल है, तुम्हारी बाहों में सिमटा, मेरा हर हाल है। खिड़की से आती धूप अब, चुभती नहीं मुझे, तुम्हारे साथ होने का, ये कैसा कमाल है। जो बुझे थे दीये, वो मशाल बन गए, उलझे हुए किस्से, अब मिसाल बन गए। किताब के पुराने पन्ने, महकने लगे फिर से, सादे से वो लफ्ज़, अब ख़्याल बन गए। अब न साँस घुटती है, न दिल घबराता है, अँधेरा भी अब तुमको देख, पास आने से कतराता है। सुलझ गई हूँ ऐसे, जैसे धागा हो रेशम का, अंत हुआ तन्हाई का, और आगाज़ हुआ 'हम' का। न अब मंज़िल की जल्दी है, न रास्तों का डर है, जहाँ तुम साथ चलते हो, वहीं अब मेरा घर है। कल तक जो शोर था, वो संगीत बन गया, खामोशी में भी अब, एक खूबसूरत असर है। हाथों में हाथ तुम्हारा, जैसे दुआ का असर हो, अब हर ढलती शाम, जैसे एक नई सहर हो। मिट गए वो फासले, जो कभी दीवार थे, सुकून का ये समंदर, अब ज़रा और गहरा हो। To be continued.... 🙏 जय हिन्द 🙏   आपका अपना  Ahasas Diary ✍️  यह कविता आपको कैसी लगी ? क्या आप भी किसी के लिए ऐसी चाहत किए है ? नीचे कमेंट में अपन...

मरहम : सिसकियों से सजदा तक (भाग - 2)

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      ★ मरहम -  सिसकियों से सजदा तक  ★ हक और हमसफर इजाज़त की क्या बात, ये हक ही तुम्हारा हैं, अँधेरे रास्तों में, तुम ही तो सितारा हो। बुझे दीयों को फिर से रोशन कर लो तुम, किस्मत का पन्ना, चाहों तो फिर भर लो तुम। गर सांसों में घुटन हैं, तो हवा बन जाऊं मैं, तुम्हारें हर मर्ज की, दवा बन जाऊं मैं। खिड़की क्या, पूरा दिल ही तुम्हारा हैं, इस उलझे हुए जीवन का, तू ही किनारा हैं। थकी आँखों को अब हकीकत का दीदार मिले, पुरानी किताबों को, नया सा किरदार मिले। तुम मरहम बनो, या खुद को सुलझा लो, बस एक बार मुस्कुरा कर, खुद को सजा लो...!! To be continued.... 🙏 जय हिन्द 🙏 आपका अपना  Ahasas Diary ✍️  यह कविता आपको कैसी लगी ? क्या आप भी किसी के लिए ऐसी चाहत किए है ? नीचे कमेंट में अपनी अहसास साझा करें।